
फागुन कृष्ण त्रयोदशी और चतुर्दशी के प्रदोषकाल के मध्य मनाए जाने वाले महापर्व महाशिवरात्रि की आपको सपरिवार अनेकों मंगलकामनाएं और हार्दिक बधाइयां।
इस दिन आदिदेव आदियोगी सदाशिव और आदिशक्ति भगवती प्रकृति पार्वती जी का विवाह संपन्न हुआ था और ब्रह्मा एवं विष्णु के मध्य श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु ज्योतिर्स्वरूप में शिवलिंग का प्राकट्य भी इसी दिन हुआ था।
योगी और ज्ञानीजन एक ज्योति और परमब्रह्म के रूप में समाधिस्थ हो शिव का ध्यान धरते हैं। शिव सम्प्पोर्ण विद्याओं के ईस्वर, वैष्णवों के अग्रगण्य, समस्त भूतों के अधीश्वर, ब्रह्म वेद के अधिपति मृत्युलोकाधिपति पशुपतिनाथ और भूतभावन है। कल्याण एवं सुख के मूल स्रोत और उनका विस्तार करने वाले तथा मङ्गलमयता की सीमा है शिव। देव दनुज यक्ष किन्नर नर आदि सभी शिव को सादर भजते हैं। सनातन धर्म की सभी जातियों मतों पंथों और संप्रदायों को एकाकार करने वाले और उनके निर्विवाद पूज्य देव हैं शिव।
शिव भाषा कला नृत्य संगीत और सृजनात्मक के जनक हैं, वे नटराज है शिव का तांडवलय सृजन की नींव रखता है। उन्हीं के डमरू से भाषा और संगीत के माहेश्वर सूत्र प्रकट हुए है। अधिकांश मंत्रों अष्टकों स्तोत्रों कथाओं पुराणों और रामायण इत्यादि आप ही के द्वारा रचित और पार्वतीजी को सुनाएं गये हैं। जिनका विभिन्न शास्त्रों में शिव पार्वती संवाद के रूप में वर्णन है।
शिव अति शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं इसीलिए उनका एक नाम आशुतोष भी है। वे जितने भोले और सरल है उतनीं ही सरल उनकी पूजा पद्धति और उपासना है। मात्र जल के एक लोटे से वे प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी पूजा में किसी भी प्रकार का कोई विशेष विधि निषेध नहीं है। उनका उपासना मंत्र “ॐ नमः शिवाय” भी अत्यंत ही सरल है।
जिनकी गोद में हिमालयसुता पार्वतीजी, मस्तक पर गङ्गाजी, ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा, कंठ में हलाहल विष और वक्ष:स्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं। वे भस्म से विभूषित, देवताओं में सर्वश्रेष्ठ सर्वेश्वर, भक्तों के पाप नाशक, सर्वव्यापक, कल्याण रूप, चन्द्रमा के सामान शुभ्रवर्ण भगवान् दांपत्य रीति के जनक श्रीगौरीशंकर युगल सदा सबका कल्याण करें। इसी शुभेच्छा सहित
सादर
~ मनोज शर्मा, चार दिशाएं